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Thursday, July 11, 2013

तीन कवितायें


 आदत

आदत नही
भूलने की
भूलें सताती हैं
कह्ते हैं ...
वो भटके राही को
राह दिखाती हैं
रोज नये दुश्मन
बन रहें हैं दोस्त.
आदते क्या सौंगाते
हमें दे के जाती हैं....


तन्हाई
तन्हा चलना
मुसीबत बन रहा है।
बहारें कब आई ..
कब गई....
पता भी ना चला।
राह चलते जो मिला
जी भर के ..
उसी ने है छला।


मजबूरी

सर्दी और महँगाई
दोनों
गरीब को
सुकड़ने पर
मजबूर करती है।
पता नही ये
पूँजी
पतियों से
क्यों डरती है....





9 comments:

  1. स्पष्ट कथ्य कहती रचित क्षणिकायें।

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  2. पूंजीपति इनको गुलाम बना के जो रखते हैं ...
    लाजवाब ...

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  3. आपने लिखा....हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें; ...इसलिए शनिवार 13/07/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

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  4. बहुत बढ़िया.....
    तीनों कविताएँ सुन्दर..

    अनु

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  5. पूंजिपतियों से तो सभी डरते हैं...
    सुंदर भाव...


    यही तोसंसार है...




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  6. सर्दी और गर्मिa गरीब को तो दोनों ही सिकुड़ने को मजबूर करती है,? बड़ा प्रशन है ये की ये पूंजीपतियों से क्यों डरती है,कहीं ये भी पूंजीपतियों का भ्रष्टाचारी सरकार के साथ कोई मिलाजुला प्रपंच तो नहीं.तीनो ही सुन्दर कवितायेँ

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  7. बहुत सुंदर क्षणिकाएं । 'मजबूरी' बहुत ही अच्छी लगी।

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